Bihar Mid Day Meal Deaths- Who is Responsible?

जब मैं ये लेख रहा हूँ, उस वक़्त तक बिहार में मिड-डे -मिल को खाने की वजह से इतनी कम और मासूम उम्र में "क़त्ल " कर दिए गए बच्चों के परिवार वालों का रुदन, उनकी चीखें, उनका विलाप, उनका क्रंदन अभी भी वहां की हवा में तैर रहे हैं....हस्पताल में खड़े हर उस बीमार बच्चे के घर वाले बस एक ही दुआ करते दिख रहे हैं कि कहीं अगली बुरी खबर उनके बच्चे के बारे में ना हो...


बहुत बुरा हुआ- जिनके बच्चे नहीं रहे और जिनके बच्चे अस्पताल में हैं.....

बुरा हुआ....शायद..आपके, मेरे और इस देश की कीड़े-मकोड़े जैसे जिन्दगी गुजर-बसर करनेवाले "आम भारतीयों" के लिए....

कुछ हुआ- कभी कभी सास-बहु, बॉलीवुड, क्रिकेट, निर्मल बाबा, सेक्स-वर्धन कैप्सूल, श्री यंत्र तावीज़, पप्पू, फेंकू, भोंकू में उलझी रहने वाली मीडिया के लिए..

ये कोई नयी और ख़ास बात नहीं- हमारे मुल्क के सियासतदानों के लिए, जिनके सामने ये मौत की नीद सुला दिए गए मासूम बच्चे, उनकी बड़ी-बड़ी गाड़ियों और कोठियों में पलने वाले बढ़िया नस्ल के तथाकथित "पप्पी" के मुकाबले कोई मायने या अहमियत नहीं रखते.....उस "रेणुका चौधरी" के लिए जो आज "टाइम्स नाउ" पर इसी विषय की बहस पर बार -बार नैपकिन/ टिश्यू से अपना मेकअप मुस्कुराते हुए संवार रही थी....

मगर क्यों ? क्यों ऐसा लगता है कि जैसे ये "हत्याएं" अब भी इस देश के जन-मानस और इसके "मालिकों" को झकझोर नहीं पा रही है ?

शायद खून देखने का शौक चढ़ गया है इस मुल्क को...लाल-लाल..गाढ़ा लाल खून..क्योंकि जब तक मौत में ट्विस्ट ना हो, कोई सनसनी ना हो, जब तक खून न बहे, गोली न लगे, छुरा ना मारा हो या फिर बलात्कार कर गाडी के नीचे ना रौंद दिया जाये तब तक इस मुल्क में लगता ही नहीं कि "हत्या" हुई है.......!!!!!!!!!!!!!!!!!!

और फिर क्या कभी जिम्मेदारी तय होगी कि इन बच्चों की हत्या का जिम्मेदार कौन है ?

वो क्यों नहीं अभी तक उस ठेकेदार को गिरफ्तार किया गया है जिसने ये माल वहां के इस स्कुल को दिया ?

क्यों नहीं स्कूल के प्राध्यापक और बाकि के अध्यापक इस बात के लिए दोषी बनाये जायें कि उन्होंने इस घटिया माल पर कभी आपत्ति नहीं की ?

क्यों नहीं अभी तक उस जिले के कलक्टर या जिलाधिकारी को तत्काल ससपेंड किया गया ? क्या ये मुमकिन है कि मिड-डे-मिल मिल की इतनी बड़ी धांधली इन बड़े अफसरों की जानकारी में नहीं होती होंगी ? और अगर नहीं भी होती होंगी तो इस बारे में कभी जांच करने की जहमत उठाई है इन लोगों ने कि इस देश के भावी कर्णधारों को दिए जाने वाला खाना किस गुणवत्ता का है....यूँ तो हर बात में कलक्टर साहब जिले के मालिक कहलाते हैं..जब लाल बत्ती में घूमते हैं तो इस " दिन दिहाड़े खून" का जवाब भी उनसे मिलना चाहिए..

शिक्षा मंत्री क्या सिर्फ नाम के मंत्री हैं ? या फिर उनका सारा समय सिर्फ इसी बात में निकल जाता है कि कौन सी सभा का उद्घाटन करना है और कौन कौन बड़े होटल में शिक्षा के आधुनिकीकरण पर लफ्फेबाज भाषणबाज़ी करनी है ? मंत्री जी जरा बताएं कि आज तक कितनी बार कितने स्कूलों के भोजन का सैंपल करवाएं हैं आपने अपने प्रदेश में ?

और कहाँ हैं सुशाशन का दंभ भरने वाले मुख्यमंत्री....क्या आपने कभी इस मिड-डे-मिल के खाने की गुणवता और उपलब्धता पर कोई पालिसी बनाई ? कभी नकेल कसी अपनी मंत्रियों और अफसरों पर कि इस मुद्दे पर कोई ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी ? या फिर आप भी बस छदम सेकुलरवाद, टोपी, तिलक की राजनीती में ही अपना मोक्ष ढूंढते रह गए ? क्या है साहस आपमें अपने मंत्रियों का इस्तीफा लेने और साथ ही साथ खुद का इस्तीफा देने का दम ?

दोस्तों, हम यूँ ही कीड़े-मकोड़ों की तरह जीते आयें हैं तो क्या हमारी मौत भी ऐसे कीड़े-मकोड़ों की तरह ही होगी...?????????????????? अब देश के नेताओं से पूछने का वक़्त आ गया है कि क्यों वो हमसे अलग हैं ?

क्यों प्रियंका गाँधी के बच्चे भी वही खाना नहीं खाते जो रायबरेली और अमेठी के स्कूल के बच्चे मिड -डे-मिल में खाते हैं ?

क्यों तीन बेटियों के बाप शिंदे के नाती-पोते भी उन्ही सरकारी स्कूलों में पढ़ते और वहीँ का खाना खाते ?

क्यों हमारे मुल्क के नेताओं और अफसरों के बच्चे बड़े-बड़े महंगे स्कूलों में पड़ते हैं और फाइव स्टार स्तर का खाना खाते हैं ?

क्यों नहीं हमारे नेताओं और सरकारी विभागों के बड़े अधिकारीयों के लिए ये अनिवार्य कर दिया जाता कि उस जिले के हर सरकारी अधिकारी के बच्चे सरकारी स्कुल में पढेंगे और वहीँ भोजन करेंगे ?

क्यों नहीं उनके परिवारों को भी उस जिले के सरकारी हस्पताल में ही इलाज़ करवाना जरुरी कर दिया जाये ?

क्यों नहीं संसद और विधानसभाओं में ठीक उसी स्तर का अनाज जाता जिस स्तर का इन स्कुल में बच्चों को बांटा जाता है ?

इस देश में अगर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारना है तो सबसे पहले इन "भाग्य-विधातायों" को जमीं पर उतार कर लाना होगा और ये व्यवस्था करनी होगी कि हर एक नेता और सरकारी कर्मचारी को सरकारी स्कूल और हस्पताल ही जाना पड़ेगा- फिर चाहे वो कलक्टर हो, जज हो, पुलिस अधीक्षक हो या वहां का सांसद या विधायक !!

क्या मीडिया भी इस सामूहिक नरसंहार को ठीक उसी तरह कई सालों तक लगातार दिखता रहेगा जिस शिद्दत के साथ उसने आरुशी के क़त्ल के केस को दिखाया है या फिर अगले शुक्रवार को नयी फिल्म या नए क्रिकेट मैच की चकाचौंध इस मौत के काले साए को निगल जायेगी ?

अब वक़्त आ गया है कि सरकारों को इस बात के लिए मजबूर किया जाये कि मिड-डे-मिल और इस किस्म की अन्य योजनायों के मानिटरिंग के लिए पुख्ता जमीनी योजना हो, ठेका प्रथा बंद हो और हादसा होने पर हर स्तर पर जिम्मेदारी तय हो....

अब कब हम "आम आदमी" अपने अपने घरों और बिलों से निकलकर अपने हकों की आवाज़ उठाएंगे ? क्यों नहीं हम खुद अपने बच्चों के स्कुल जाकर इस गंदगी के खिलाफ लामबंद होकर आवाज़ उठाते ? क्या कोई फ़रिश्ता आएगा हमारी जिम्मेदारियों को उठाने के लिए ?

आखिरकार दोषी तो हम ही हैं..हम ही लोगों ने मारा है खुद अपने बच्चों को- हाँ ये बात अलग है कि उनको मारने की सुपारी दी है हमने इन लोगों को- इन नेताओं को, इन अफसरों को, इन ठेकेदारों को, इन गुंडों और बाहुबलियों को....

अब सवाल पूछने का समय जा चूका है ...अब जवाब लेने का वक़्त है......

" वो मेरे बच्चों की लाश का मुआवजा तय करने में लगे हैं,
जिनके खुद के ईमान की कीमत दो कौड़ी की नहीं,
वो आज इस मुल्क के हालात बदलने की बात करते हैं,
जो खुद चलती-फिरती जिन्दा लाशों से कम नहीं.."


वोट आपक, देश आपका, फैसला आपका !!

जय हिन्द !! वन्दे मातरम !!